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भारतीय परिषद अधिनियम (1861) भारत के संवैधानिक इतिहास की एक युगांतकारी तथा महत्त्वपूर्ण घटना है। यह मुख्य रूप से दो कारणों से विशेष है। एक तो यह कि इसने गवर्नर-जनरल को अपनी विस्तारित परिषद में भारतीय जनता के प्रतिनिधियों को नामजद करके उन्हें विधायी कार्य से संबद्ध करने का अधिकार प्रदान दिया तथा दूसरा यह कि इसने गवर्नर-जनरल की परिषद की विधायी शक्तियों का विकेन्द्रीकरण कर दिया, जिससे बम्बई और मद्रास की सरकारों को भी विधायी शक्ति प्रदान की गयी।
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